सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज जी के अनमोल प्रवचन USA (East Coast) के वर्चुअल समागम  के दौरान

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धन निरंकार जी।🙏

 सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महराज के पावन पुनीत प्रवचनों के सारांश,  जिन्हें सच्चेपातशाह जी ने  6 अगस्त को आयोजित USA (East Coast) के वर्चुअल समागम  के दौरान प्रेषित किए।

 

1. हम जो बोलते हैं या दूसरों को उपदेश देते हैं वह शब्द और भाव पहले हमारे अपने जीवन में परिलक्षित होने चाहिए।* वह हमारे किरदार का हिस्सा होना चाहिए।

 

2. किरदार आदतों से बनता है। आदतें हमारे दोहराए गए कर्मों को कहते हैं और कर्मों का निर्णय हमारे विचारों द्वारा होता है। अतः, हमें *सबसे पहले अपने विचार नेक करने होंगे। अपने विचारों का आधार परमात्मा को बना कर सबके भले के लिए सोच रखनी होगी। तभी हमारे कर्म और फिर हमारा किरदार भी सुंदर बनेगा।

3. हम आज एक गीत सुन रहे थे कि जो भी होता है वह ठीक होता है। फिर भी मन क्यूं उदास होता है? यदि हमारी चाहत के अनुसार कुछ नहीं होता तब मन क्यूं बेचैन हो जाता है? क्योंकि हम उसमें परमात्मा की रज़ा को नहीं देख रहे होते है। *जो हो रहा है उसे ईश्वर की कृपा मानकर देखें तभी संतोष बना रहेगा।

4. संतोष का अर्थ यह नहीं कि हम कर्म करना ही छोड़ दें। निरंकार ने हमें कर्म करने की आज़ादी भी दी है। अपना कर्म पूरी मेहनत और विवेक से करना है परन्तु उसके परिणाम को इस निरंकार पर छोड़ देना है।

5. हमें यह ब्रह्मज्ञान भ्रमों और विकारों से निजात प्राप्त करने के लिए प्रदान किया गया है। यदि अब भी हम भ्रमों में फसे हैं तब इस ज्ञान का कुछ भी लाभ नहीं है।

6. अपने किरदार को सदैव self improvement (स्वयं सुधार) की ओर लेकर जाएं।* विकारों को अपने किरदार से दूर करें। पहले तो मनुष्य केवल जाति, भाषा, खान पान के आधार पर दूसरों को नीचा समझ कर नफ़रत करता था किन्तुअब और नए आधार बना लिए गए हैं। *कई बार हम दूसरों से इस लिए नहीं मिलते क्योंकि हम समझते हैं कि हम उनसे ज़्यादा पढ़े लिखे और विद्वान हैं। हमें इन सभी भेदभावों से ऊपर उठना है।

7. सोशल मीडिया का प्रभाव आजकल काफी होता जा रहा है।* कई influencers (प्रभावित करने वाले व्यक्ति) सोशल मीडिया पर निरंतर अपनी सलाह देते हैं और समाज के लोग उसी को सच्चा एवं अच्छा मानकर उसका अनुमोदन करने लग जाते हैं। किन्तु एक ब्रह्मज्ञानी संत सब कुछ सोच समझकर ही करता है। *पहले हम यह देखें और परखें कि वह क्या कह रहा है? क्या वह ज्ञान और विवेक की दृष्टि से उचित है? यदि नहीं तो हमें ऐसी बातों पर ध्यान ही नहीं देना है।

8. दातार सबको दृढ़ भक्ति बक्शे ताकि सेवा, सुमिरन और सत्संग पर ध्यान केंद्रित करते हुए हम अपने कर्मों से प्रचार करें न कि सिर्फ़ बोलों से।

धन निरंकार जी 🙏

संं

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