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दुबड़ी का पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया।

दुबड़ी का पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया।

मसूरी। जौनपुर विकासखंड के गांवांे में दुबड़ी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। जिसके तहत टकारना, गैड व लगडासू सहित अन्य गांवों में दुबड़ी का पर्व पारंपरिक रीति रिवाज के साथ मनाया गया। इस मोके पर ग्रामीणों ने ढोल दमाउ की थाप पर जमकर नृज्य किया।


दुबड़ी पर्व को खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है जो दुर्गाष्ठमी के दिन मनाया जाता है। इस मौके पर ग्रामीणों ने पारम्परिक वाद्ययंत्रों व ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य कर भूमि व कुलदेवता से क्षेत्र के सुख-समृद्धि की कामना की। दुबड़ी पर्व भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व को मनाने की तैयारी स्वछता अभियान से शुरू होती है और दुबड़ी से एक दिन पूर्व गांव की सभी महिलाएं अपने घर-आंगनों, पंचायती चौक एवं रास्तों की सामूहिक रूप से साफ़ सफाई करती हैं। जिसके बाद अगले दिन दोपहर के समय गांव के पुरुष एवं बच्चे खेतों से फसलें लाकर पंचायती चौक में इक्क्ठा करके एक बड़ा गट्ठर बनाते हैं। गांव के बुजुर्गों के निर्देश नई उस फसलों के गट्ठर को एक मीटर गहरे खड्ढे में गाढ़ा जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में दुबड़ी कहा जाता है। संध्या के समय गांव की सभी महिलाएं पंचायती चौक में पहुंचकर दुबड़ी की पूजा-अर्चना कर भूमि देवता व कुल-ईष्ट देवता से गांव की खुशहाली एवं समृद्धि की कामना करती हैं। दुबड़ी पर्व के दिन स्थानीय अनाज झंगोरा व कोणी के आटे को पीसकर उसे पकाकर उसकी छोटी छोटी गोलियां बनाई जाती हैं जिसे पिनोले कहा जाता है। यह दुबड़ी पर्व का विशेष पकवान होता है जिसे खांड चीनी का बूरा और शुद्ध घी के साथ प्रसाद के रूप में खाया जाता है। टकारना गांव के पूर्व प्रधान राजेदं्र रावत ने बताया कि दुबड़ी पर्व इस क्षेत्र का प्रमुख पर्व है और इसके बाद से ही त्योहार खुल जाते हैं इसे पहल त्योहार माना जाता है। उन्होंने बताया कि इसे मनाने की परंपरा पुराने जमाने से चली आ रही है। इसे अजान का पर्व माना जाता है। उन्होंने बताया कि इस पर्व में इन दिनों होने वाले 12 प्रकार के अनाज की फसल के पौधे लाये जाते हैं जिसमें झंगोरा, कौणी, धान मक्की आदि होते हैं उनके पौधों को एक पेड़ के तने के सहारे गढढा खोद कर खड़ा किया जाता है तथा इसको सजाया जाता है वहीं महिलाएं दुबड़ी की पारंपरिक वेशभूषा में आकर पूजा करती हैं मंगल गीत गाती है व उसके बाद गावं के पुरूष विशेष कर युवा दुबड़ी उखाड़ने को उत्सुक रहते हैं व पूरे उत्साह के साथ इसे उखाड़ा जाता है। तथा इसमें जिस व्यक्ति के हाथ जिसका पौधा आता है उसे प्रसाद के रूप में घर ले जाया जाता है। दुबड़ी गिराने के बाद पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ जमकर महिलाएं व पुरूष लोकनृत्य करते हैं तथा इस पर्व पर बनने वाला विशेष पकवान पिनोले जो झंगोरे व काैंणी को पीस कर उसके आटे से बनाया जाता है मेहमानों को परोसा जाता है जिसे घी व शक्कर के साथ खाया जाता है। इस पर्व को सुख व समृद्धि का पर्व माना जाता है जिसमें गावं की लड़कियां जिनकी शादी हुई होती है व गांव आती है तथा दुबड़ी की पूजा करती हैं वहीं पर्व को मनाने जो भी लोग बाहर अपनी रोजी रोटी के लिए जाये रहते हैं सभी लौट कर गांव आते हैं व पर्व को उत्साह के साथ मनाते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी भी इस परंपरा को आगे बनाये रख सके।

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