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भारत निर्वाचन आयोग को मोर्चा की मांग पर भेजा पत्र मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने गरीब जनप्रतिनिधि नहीं बनेंगे तो गरीबों की कौन सुनेगा।

विकासनगर- जन संघर्ष मोर्चा अध्यक्ष एवं जीएनवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने चुनावी प्रक्रिया में व्यापक सुधार /परिवर्तन, पूंजीपतियों के बढ़ते दखल, चुनाव के समय टीनएजर्स (17-18- 19 वर्ष के) को तमाम तरह के नशे परोसने आदि तमाम मामलों को लेकर कुछ दिन पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी, उत्तराखंड श्री वीबीआरसी पुरुषोत्तम से मुलाकात कर मुख्य चुनाव आयुक्त, भारत सरकार को संबोधित ज्ञापन सौंपा था , जिसके क्रम में 25 मार्च 2026 को मुख्य निर्वाचन

अधिकारी, उत्तराखंड ने इलेक्शन कमिशन आफ इंडिया को पत्र प्रेषित किया। नेगी ने कहा कि विगत कुछ वर्षों से,जिस प्रकार से लोकसभा- विधानसभा व अन्य चुनावों में पूंजीपतियों का दखल बढा है यानि पूंजीपति अपने पैसे के दम पर जनप्रतिनिधि बनने लगे हैं ,उससे गरीबों व आखिरी पंक्ति में बैठे व्यक्ति को न्याय नहीं मिल पा रहा है। उक्त के चलते लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं ध्वस्त हो रही हैं। नेगी ने कहा कि चुनाव में पोलिंग के दौरान पोलिंग स्टेशन से बाहर लगने वाले स्टॉल (बस्तों) पर रोक लगनी चाहिए, क्योंकि सरकार द्वारा हर पोलिंग स्टेशन पर बीएलओ तैनात किए हुए हैं तथा नाम की पर्चियां घर-घर पहुंच जाती हैं; तो ऐसे में बस्तों की जरूरत क्या है! इसके साथ-साथ मतदाता की उम्र 18 वर्ष निर्धारित की गई है, जबकि पूर्व की भांति 21 वर्ष होनी चाहिए; क्योंकि इन टीनएजर्स को प्रत्याशी हर तरह के नशे परोस कर बर्बाद कर रहे हैं, जिससे समाज में नशा करने वाले युवाओं की तादाद काफी बढ़ रही है। काबिल-ए-गौर है कि 18 वर्ष का युवा आईटी, विज्ञान आदि हर क्षेत्र में झंडा तो गाढ़ सकता है, लेकिन जनसरोकर व सामाजिकता की बारिकियों को समझने में कई दशकों लग जाते हैं। इसके साथ-साथ चुनाव के दौरान रैलियों में मोटरसाइकिल/ स्कूटरों का अंधाधुंध इस्तेमाल भी युवाओं को बर्बाद करने का काम करता है। 18 साल मतदान की उम्र होने से एक तरह से परिपक्व लोकतंत्र स्थापित हो रहा है यानि एक 18 साल का युवा लोकसभा/ विधानसभा चुनाव में प्रतिभाग कर अप्रत्यक्ष तौर पर राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री का चुनाव करता है। पूंजीपतियों के चुनाव में दखल के चलते गरीब व माध्यम वर्गीय जनता को इंसाफ नहीं मिल पाता, क्योंकि इन पूंजीपतियों का उद्देश्य तो सिर्फ और सिर्फ चुनाव में लगाई गई रकम को कई गुणा बढ़ाना होता है। समय रहते लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने हेतु चुनावी प्रक्रिया में गुणात्मक सुधार की आवश्यकता है।

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