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ब्रह्मज्ञान को जीवन में उतारना ही सच्ची जागृति: सतगुरु माता सुदीक्षा जी

79वां वार्षिक निरंकारी संत समागम प्रेम, भक्ति और मानवता के संदेश के साथ संपन्न, 80 कवियों ने ‘जागृति’ विषय पर प्रस्तुत कीं स्वरचित कविताएं

विकास नगर, समालखा, 27 अक्टूबर। आध्यात्मिक जागृति, प्रेम, भक्ति और मानवता के संदेश के साथ 79वां वार्षिक निरंकारी संत समागम संपन्न हो गया। समापन अवसर पर निरंकारी सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि ब्रह्मज्ञान की वास्तविक सार्थकता उसे जीवन में अपनाने और अपने विचारों, व्यवहार तथा कर्मों में उतारने में है। आध्यात्मिक ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब उसका प्रभाव व्यक्ति के दैनिक जीवन और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार में दिखाई दे।

‘जागृति’ विषय पर केंद्रित इस संत समागम में श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ प्रेम, करुणा, विनम्रता और आपसी सद्भाव को अपनाने की प्रेरणा दी गई। समागम के दौरान सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने जीवन में परमात्मा के एहसास को बनाए रखने और आध्यात्मिक शिक्षाओं को व्यवहार में शामिल करने पर जोर दिया।

जीवन के हर पल में परमात्मा का एहसास ही जागृति

सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने अपने प्रवचनों में समझाया कि जागृति केवल सत्संग या संत समागम तक सीमित रहने वाली अनुभूति नहीं है, बल्कि यह जीवन के हर पल में निराकार परमात्मा का एहसास बनाए रखने और उसी के अनुरूप जीवन जीने की प्रेरणा है। ब्रह्मज्ञान का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्त करना नहीं, बल्कि उसे अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों में शामिल करना है।

उन्होंने सकारात्मक सोच अपनाने, दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखने तथा विनम्रता के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी। साथ ही दूसरों की कमियों को देखने के बजाय उनकी खूबियों को पहचानने पर बल दिया। उनके संदेश के अनुसार, वास्तविक आध्यात्मिक जागृति की शुरुआत व्यक्ति के अपने जीवन और घर-परिवार से होती है। जब व्यक्ति अपने व्यवहार में प्रेम, सहनशीलता और सद्भाव को स्थान देता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव समाज पर भी पड़ता है।

सतगुरु माता जी ने सेवा, सुमिरन और सत्संग को जीवन का अभिन्न अंग बनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि हर परिस्थिति में परमात्मा का एहसास बनाए रखना जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाता है।

80 कवियों ने ‘जागृति’ विषय पर प्रस्तुत कीं रचनाएं

79वें वार्षिक निरंकारी संत समागम के चारों दिन आयोजित बहुभाषी कवि दरबार श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इसमें बाल कवियों के साथ महिला और पुरुष कवियों ने भी उत्साहपूर्वक भाग लिया। कुल 80 कवियों ने ‘जागृति’ विषय पर अपनी स्वरचित कविताएं प्रस्तुत कीं।

कवि दरबार में हिंदी, राजस्थानी, पंजाबी, अंग्रेजी, हरियाणवी, मुल्तानी, मराठी, भोजपुरी और संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में काव्य प्रस्तुतियां दी गईं। इन रचनाओं के माध्यम से आध्यात्मिक जागृति, प्रेम, सद्भाव और मानवीय मूल्यों से जुड़े भावों को अभिव्यक्त किया गया। विभिन्न भाषाओं में हुई इन प्रस्तुतियों ने समागम में सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति को स्थान दिया।

संत निरंकारी मंडल ने जताया आभार

समापन अवसर पर संत निरंकारी मंडल के सचिव जोगिंदर सुखीजा ने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता जी के दर्शन तथा आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने समागम के आयोजन में सहयोग देने वाली साध-संगत और विभिन्न सरकारी विभागों का आभार जताया। उन्होंने इस वर्ष समागम में श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड उपस्थिति पर प्रसन्नता भी व्यक्त की।

प्रेम और सद्भाव का संदेश लेकर लौटे श्रद्धालु

79वां वार्षिक निरंकारी संत समागम प्रेम, भक्ति और मानवता की भावना के साथ संपन्न हुआ। समागम के दौरान दिए गए आध्यात्मिक संदेशों ने श्रद्धालुओं को ब्रह्मज्ञान की शिक्षाओं को दैनिक जीवन में अपनाने, आपसी संबंधों में प्रेम बनाए रखने और समाज में सद्भाव को बढ़ावा देने की प्रेरणा दी।

समागम से आध्यात्मिक प्रेरणा और मधुर स्मृतियां लेकर श्रद्धालु अपने -अपने गंतव्यों की ओर रवाना हुए। इस आयोजन ने अनेकता में एकता, मानवीय मूल्यों और आध्यात्मिक जागृति के संदेश को प्रमुखता से प्रस्तुत किया।

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