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ब्रह्मज्ञान को जीवन में उतारना ही सच्ची जागृति: सतगुरु माता सुदीक्षा जी


‘जागृति’ विषय पर केंद्रित इस संत समागम में श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक जीवन के साथ-साथ प्रेम, करुणा, विनम्रता और आपसी सद्भाव को अपनाने की प्रेरणा दी गई। समागम के दौरान सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज ने जीवन में परमात्मा के एहसास को बनाए रखने और आध्यात्मिक शिक्षाओं को व्यवहार में शामिल करने पर जोर दिया।
जीवन के हर पल में परमात्मा का एहसास ही जागृति
उन्होंने सकारात्मक सोच अपनाने, दूसरों के प्रति प्रेम और करुणा का भाव रखने तथा विनम्रता के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दी। साथ ही दूसरों की कमियों को देखने के बजाय उनकी खूबियों को पहचानने पर बल दिया। उनके संदेश के अनुसार, वास्तविक आध्यात्मिक जागृति की शुरुआत व्यक्ति के अपने जीवन और घर-परिवार से होती है। जब व्यक्ति अपने व्यवहार में प्रेम, सहनशीलता और सद्भाव को स्थान देता है, तो उसका सकारात्मक प्रभाव समाज पर भी पड़ता है।
सतगुरु माता जी ने सेवा, सुमिरन और सत्संग को जीवन का अभिन्न अंग बनाने की प्रेरणा देते हुए कहा कि हर परिस्थिति में परमात्मा का एहसास बनाए रखना जीवन को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाता है।
80 कवियों ने ‘जागृति’ विषय पर प्रस्तुत कीं रचनाएं
कवि दरबार में हिंदी, राजस्थानी, पंजाबी, अंग्रेजी, हरियाणवी, मुल्तानी, मराठी, भोजपुरी और संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में काव्य प्रस्तुतियां दी गईं। इन रचनाओं के माध्यम से आध्यात्मिक जागृति, प्रेम, सद्भाव और मानवीय मूल्यों से जुड़े भावों को अभिव्यक्त किया गया। विभिन्न भाषाओं में हुई इन प्रस्तुतियों ने समागम में सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक विचारों की अभिव्यक्ति को स्थान दिया।
समापन अवसर पर संत निरंकारी मंडल के सचिव जोगिंदर सुखीजा ने सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज और निरंकारी राजपिता जी के दर्शन तथा आशीर्वाद के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने समागम के आयोजन में सहयोग देने वाली साध-संगत और विभिन्न सरकारी विभागों का आभार जताया। उन्होंने इस वर्ष समागम में श्रद्धालुओं की रिकॉर्ड उपस्थिति पर प्रसन्नता भी व्यक्त की।